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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || ༺•|✤ आपकी सफलता हमारा ध्‍येय ✤|•༻

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भारत में छठ सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है। मूलत: सूर्य षष्‍ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्‍ल पक्ष षष्‍ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ कार्तिक शुक्‍ल पक्ष षष्‍ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धी तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। स्‍त्री और पुरूष समान रूप से इस पर्व को मनाते हैं। छठ व्रत के सम्‍बन्‍ध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्‍ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएं पूरी हुई तथा पांडवों को उनका राजपाट वापस मिला। लोक परम्‍परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का सम्‍बन्‍ध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्‍ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्‍ठी तिथि (छठ) को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्‍वी की सतह पर सामान्‍य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं इस कारण इसके सम्‍भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्‍भव रक्षा करने का सामर्थ्‍य प्राप्‍त होता है। पर्व पालन से सूर्य प्रकाश के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा सम्‍भव है। पृथ्‍वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिलता है। सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्‍वी के वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपनी ऑक्‍सीजन तत्‍व को संश्‍लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्‍वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्‍वी की सतह पर केवल उसका नगण्‍य भाग ही पहुँच पाता है। सामान्‍य अवस्‍था में पृथ्‍वी की सतह पर पहुँचने वाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्‍यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है। अत: सामान्‍य अवस्‍था में मनुष्‍यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्‍य या जीवन को लाभ होता है। छठ जैसी खगोलीय स्थिति सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्‍वी पर पुन सामान्‍य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती है। वायुमंडल के स्‍तरों से आवर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, सूर्यास्‍त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है। ज्‍योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्‍या के छ: दिन उपरान्‍त आती है। ज्‍योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।

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