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TRIVENI TYPING MANSAROVAR COMPLEX CHHINDWARA MOB-7089973746
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असहाय और पिछड़ा हुआ है, इसलिए उसे रक्षण मिलना चाहिए और मदद मिलनी चाहिए। मुझे इसकी खुशी है कि रक्षण की व्यवस्था केवल दस साल के लिए रखी जा रही है। आज जो लोग हर तथ्य को सांप्रदायिक नजरिये से आंकने की कोशिश करते हैं, उन्हें इस तथ्य पर गौर फरमाना चाहिए। संविधान सभा में बिहार से निर्वाचित तजम्मुल हुसैन ने विधायी संस्थाओं में धर्म और जाति-वर्ग के आधार पर आरक्षण का जोरदार विरोध करते हुए कहा था, स्थानों का रक्षण, चाहे वह किसी भी रूप में और किसी भी संप्रदाय या वर्ग के लिए किया जाए, सिद्धांत की दृष्टि से बिल्कुल गलत है। अपनी तो पक्की राय यह है कि स्थानों के रक्षण की व्यवस्था किसी के लिए भी नहीं होनी चाहिए और मुसलमान होने की हैसियत से कहता हूं कि मुसलमानों के लिए भी यह न होना चाहिए। साफ है, यह काम समुद्र मंथन से कम न था। संविधान सभा के समक्ष रजवाड़ों में बंटे देश, जातियों और धर्मों में विभक्त समाज, भौगोलिक विषमताओं के शिकार भूभाग, भाषायी विभाजनों और सदियों की दरिद्रता से उपजी विषमता से एक साथ जूझने की जिम्मेदारी थी। यही वजह है कि लगभग हर महत्वपूर्ण विषय पर गहरे मतभेद उभरे। राष्ट्रभाषा का सवाल हो, केंद्र की शक्ति का प्रश्न हो या आरक्षण का मुद्दा, इन सभी पर तीखी बहस हुई। इसके बावजूद आम सहमति का एक विषय सबको जोड़े हुए था और वह था- हर नागरिक को वोट देने का अधिकार आप जानना चाहेंगे कि कौन क्या मानता था डॉक्टर भीमराव आंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू शक्तिशाली केंद्र के पक्ष में थे। उनका कहना था कि विभाजन के बाद देश की एकता बनाए रखने और गरीबी दूर करने के लिए केंद्र का मजबूत होना जरूरी है। इसके विपरीत के संथानम और उनके साथियों का तर्क था कि राज्यों को अधिक स्वायत्तता और वित्तीय संसाधन
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