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TRIVENI TPYING MANSAROVAR COMPLEX CHHINDWARA MOB- 7089973746

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हिंदी का दिल सिकुड़ गया है। वह समाज की, सत्य की लाख बात करे, उसका सारा सत्य, यथार्थ, कमिटमेंट और संघर्ष एकदम प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह है। साहित्य भी अब 280 कैरेक्टर्स , इंस्टा रील्स या सेल्फी में सीमित रह गया है। हम नाचे, गाए, ठुमका लगाए, दारू चढ़ाए और छाए। उसके बाद फिर हाय-हाय। हरेक की करनी हर लेखक याद रखता है और मौका आते ही उसे ब्याज समेत वापस करता है! ऐसे में, किसका शोक और कैसा शोक? फिर भी रस्म अदायगी के लिए कुछ तो गमजदा दिखना पड़ता है, इसलिए अवसर आते ही हर हिंदी वाला दो मिनट का मौन बन जाता है। इस दो मिनट के मौन में भी वह कितना मौन रहता है, उसकी आंखें किसे-किसे टटोलती हैं, किस-किस से क्या-क्या बोलती हैं, यह वही जानता है, जो दो मिनट के मौन का एक्सपर्ट होता है। इतने पर भी यदि उसका मन कुछ सेकंड के लिए पसीज जाता है, तो वह जाने वाले को याद करके हर लाइन में अपना महत्व बताने लगता है कि मैं उनको इतने निकट से जानता था, जितना वह भी अपने को नहीं जानते थे। कृतघ्न हिंदी ने उनको उनका हक नहीं दिया! मन करता है कि कहूं कि हम भी कैसे हो चले हैं, जो जीते जी किसी को नहीं पूछते, लेकिन उसके सिधारते ही उसे देवता बनाने में लग जाते हैं। इससे तो अच्छी आज की जेन जी है, जो जब किसी लेखक को पसंद करती है, याद करती है, तो बेधड़क बिंदास याद करती है। इसीलिए विश्व पुस्तक मेले में दीवार में एक खिड़की रहती थी साक्षात् दिखी, जिसे इस पीढ़ी ने एक सेल्फी पॉइंट बना लिया। यह भी अलग तरह की मार्केटिंग रणनीति रही। हिंदी का इसी में कल्याण है। मेले में कोई रचना अगर एक पीढ़ी का सेल्फी पॉइंट बन जाती है, तो हिंदी का दिल सिकुड़ गया है। वह समाज की, सत्य की लाख बात करे, उसका सारा सत्य, यथार्थ, कमिटमेंट और संघर्ष एकदम प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह है। साहित्य भी अब 280 कैरेक्टर्स , इंस्टा रील्स या सेल्फी में सीमित रह गया है। हम नाचे, गाए, ठुमका लगाए, दारू चढ़ाए और छाए। उसके बाद फिर हाय-हाय। हरेक की करनी हर लेखक याद रखता है और मौका आते ही उसे ब्याज समेत वापस करता है! ऐसे में, किसका शोक और कैसा शोक? फिर भी रस्म अदायगी के लिए कुछ तो गमजदा दिखना पड़ता है, इसलिए अवसर आते ही हर हिंदी वाला दो मिनट का मौन बन जाता है। इस दो मिनट के मौन में भी वह कितना मौन रहता है, उसकी आंखें किसे-किसे टटोलती हैं, किस-किस से क्या-क्या बोलती हैं, यह वही जानता है, जो दो मिनट के मौन का एक्सपर्ट होता है। इतने पर भी यदि उसका मन कुछ सेकंड के लिए पसीज जाता है, तो वह जाने वाले को याद करके हर लाइन में अपना महत्व बताने लगता है कि मैं उनको इतने निकट से जानता था, जितना वह भी अपने को नहीं जानते थे। कृतघ्न हिंदी ने उनको उनका हक नहीं दिया! मन करता है कि कहूं कि हम भी कैसे हो चले हैं, जो जीते जी किसी को नहीं पूछते, लेकिन उसके सिधारते ही उसे देवता बनाने में लग जाते हैं। इससे तो अच्छी आज की जेन जी है, जो जब किसी लेखक को पसंद करती है, याद करती है, तो बेधड़क बिंदास याद करती है। इसीलिए विश्व पुस्तक मेले में दीवार में एक खिड़की रहती थी साक्षात् दिखी, जिसे इस पीढ़ी ने एक सेल्फी पॉइंट बना लिया। यह भी अलग तरह की मार्केटिंग रणनीति रही। हिंदी का इसी में कल्याण है। मेले में कोई रचना अगर एक पीढ़ी का सेल्फी पॉइंट बन जाती है, तो

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