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क्रिकेट भारत में केवल एक खेल नहीं, बल्कि भावना, गर्व और पहचान का विषय है। जब बात भारत के उपमहाद्वीपीय पड़ोसियों—विशेष रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और अफगानिस्तान—के साथ क्रिकेट संबंधों की आती है, तो प्रतिक्रियाएँ अक्सर तीखी और भावनात्मक हो जाती हैं। इन देशों के साथ भारत के क्रिकेट रिश्ते खेल से कहीं अधिक, राजनीति, कूटनीति और जनभावनाओं से जुड़े रहे हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट संबंध सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव का सीधा असर क्रिकेट पर भी पड़ा है। लंबे समय से द्विपक्षीय श्रृंखला नहीं खेली गई है और मुकाबले केवल आईसीसी टूर्नामेंट या एशिया कप तक सीमित रह गए हैं। जब भी भारत और पाकिस्तान आमने-सामने आते हैं, तो दर्शकों की भावनाएँ चरम पर होती हैं। जीत-हार के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ, बयानबाजी और बहस आम बात बन जाती है।
सरकार और क्रिकेट बोर्ड भी इस मामले में सतर्क रुख अपनाते रहे हैं। सुरक्षा चिंताओं और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण कई बार भारत ने पाकिस्तान दौरे से परहेज किया है। वहीं, कुछ वर्गों का मानना है कि खेल को राजनीति से अलग रखना चाहिए, जबकि दूसरा वर्ग इसे राष्ट्रीय सम्मान और सुरक्षा से जोड़कर देखता है। इसी टकराव के कारण हर बड़े टूर्नामेंट के दौरान क्रिकेट संबंधों पर बहस तेज हो जाती है।
बांग्लादेश के साथ भारत के क्रिकेट संबंध अपेक्षाकृत बेहतर रहे हैं, लेकिन यहाँ भी भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती हैं। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश क्रिकेट टीम के प्रदर्शन में सुधार हुआ है, जिससे मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी बने हैं। कुछ मैचों के दौरान खिलाड़ियों और प्रशंसकों के व्यवहार को लेकर विवाद भी सामने आए हैं। इसके बाद दोनों देशों के प्रशंसकों के बीच सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। हालांकि, आधिकारिक स्तर पर दोनों बोर्डों के संबंध सामान्य और सहयोगात्मक बने हुए हैं।
श्रीलंका के साथ भारत के क्रिकेट संबंध पारंपरिक रूप से मजबूत रहे हैं। दोनों देशों के बीच नियमित द्विपक्षीय श्रृंखलाएँ खेली जाती हैं और खिलाड़ियों के बीच आपसी सम्मान भी दिखाई देता है। इसके बावजूद, जब कोई विवादास्पद निर्णय या करीबी मुकाबला होता है, तो प्रतिक्रियाएँ तेज हो जाती हैं। श्रीलंका में राजनीतिक या आर्थिक संकट के समय भारत द्वारा दिए गए समर्थन का असर क्रिकेट संबंधों पर भी सकारात्मक रूप से देखा गया है।
अफगानिस्तान के साथ भारत के क्रिकेट संबंध एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। भारत ने अफगान क्रिकेट को अंतरराष्ट्रीय मंच पर आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अफगान टीम ने कई बार भारत को कड़ी टक्कर दी है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के प्रशंसकों के बीच सम्मान और सकारात्मक भावना बनी रहती है। भारत में अफगानिस्तान के घरेलू मैचों का आयोजन भी इस सहयोग का प्रतीक है।
इन सभी संबंधों में एक समान बात यह है कि क्रिकेट भावनाओं को तेजी से भड़काता है। मीडिया कवरेज, टीवी डिबेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर छोटी-सी घटना भी बड़ी बहस का रूप ले लेती है। कई बार खिलाड़ियों के बयान, मैदान पर हुई घटनाएँ या दर्शकों का व्यवहार विवाद का कारण बन जाता है। इससे खेल की जगह राष्ट्रवाद और राजनीति केंद्र में जाते हैं।
भारतीय क्रिकेट बोर्ड यानी बीसीसीआई अक्सर संतुलित रुख अपनाने की कोशिश करता है। उसका मुख्य ध्यान खिलाड़ियों की सुरक्षा, खेल की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन पर रहता है। आईसीसी और एशियाई क्रिकेट परिषद जैसे संगठन भी चाहते हैं कि खेल के जरिए देशों के बीच संवाद और सहयोग बढ़े। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि उपमहाद्वीप में क्रिकेट और राजनीति को पूरी तरह अलग करना आसान नहीं है।
अंततः कहा जा सकता है कि भारत के अपने उपमहाद्वीपीय पड़ोसियों के साथ क्रिकेट संबंध जटिल और बहुस्तरीय हैं। इनमें प्रतिस्पर्धा, सहयोग, तनाव और भावना—all एक साथ मौजूद हैं। तीखी प्रतिक्रियाएँ भले ही सुर्खियाँ बनती हों, लेकिन खेल का असली उद्देश्य आपसी समझ, सम्मान और मनोरंजन होना चाहिए। यदि क्रिकेट को सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए, तो यह देशों के बीच दूरी कम करने का माध्यम भी बन सकता है। भविष्य में यही चुनौती और अवसर दोनों होंगे कि भावनाओं को संतुलित रखते हुए खेल की आत्मा को बनाए रखा जाए।

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