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सुजीत टायपिंग सेंटर

created Oct 10th, 06:30 by Majhi Bhawan thanvatola


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इस तरह की गतिविधियों से जमीन से जुडे कार्यकर्त्‍ताओं में धर्म संकट जैसी स्थिति उत्‍पन्‍न हो जाती है। इनके लिए सही विचारधारा का चुनाव करना अत्‍यंत जटिल हो जाता है। अनेक नेता अगर किसी दूसरी पार्टी से समझौता कर लेते है लेते है तो उनके लिए एक खालीपन जाता है इसका उदाहरण हम पिछले दिनों हुए कांग्रेस का बहुजन समाज पार्टी से हुए गठबंधन से ले सकते है। इस गठबंधन के साथ उत्‍तरप्रदेश में चुनाव लड़ा गया। पार्टी को चुनाव में स्‍थान तो पहले की है अपेक्षा अधिक अच्‍छा मिला किंतु इन दोनों पार्टी के जमीन कार्यकार्ताओं के लिए यह एक असमंजस की स्थिति थी। जिस पार्टी की विधाराधारा ही कांग्रेस की विचारधारा से एकदम हट कर हो उन कार्यकार्ताओं द्वरा ऐसा समझौता अपनी भावनाओं के साथ समझौता जैसा ही था। आर्थिक सामाजिक राजनीतिक अन्‍य विचारों पर एक दूसरे से बिल्‍कुल विपरीत होने के पश्‍चात् भी पार्टियों के उच्‍चस्‍तर के नेताओं द्वारा समझौता हुआ। इसका बुरा असर उन क्षेत्रीय कार्याकर्ताओं पर पड़ा जिन स्‍थानों पर केवल बसपा के नेताओं ने चुनाव लड़ा। वहॉं कांग्रेस के कार्यकर्ता अपने आप को खाली सा अनुभव कर रहे थे। यदि उच्‍च स्‍तर के नेता बसपा से समझौता करते है तो जमीनी कार्यकर्ताओं अपनी दशकों से चली रहीं नीतियों को एक तरफ कैसे रख दें। परिणामस्‍वरूप ऐसे कार्यकर्ताओं की राजनीति के प्रति उदासीनता बढ़ी है। छोटे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं एक नई स्थिति को लेकर भ्रम में पड़े हुए है कि लगभग दो वर्ष पहले जब श्री अर्जुन सिंह ने अपनी नई पार्टी का गठन किया तो जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं भी आपस में काफी तनाव की स्थिति रही और कांग्रेस का चुनाव में हारने का कारण कांग्रेस रहीं और एक समय में कांग्रेस के कार्यकर्ता अपने आपकों सिद्धंत के आधार पर बँटा देख कर काफी असमंजस में अनुभव कर रहे थे वही कार्यकर्ता चुनावों के दौरान काफी उत्‍तेजक हो गए। अब उन्‍हीं कार्यकर्ताओं को एक ही पार्टी में होना पड़ा है क्‍योंकि उनके शीर्षस्‍था नेतओं में विलय का समझौता हो गया है। अंत: यह जमीन से जुडें कार्यकर्ताओं के लिए एक अजीबों गरीब स्थिति थी।

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