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साँई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565

created Nov 28th 2022, 06:54 by sandhya shrivatri


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चाहे लोग सुन्‍दर हों या कुरूप, आपसे मैत्री भाव रखते हों अथवा शत्रु भाव, लेकिन इसमें तो कोई संशय नहीं है कि वे हमारे समान मनुष्‍य है।  वे हमारे ही समान सुख चाहते है। दु:ख कोई भी नहीं चाहता। और दु:ख पर काबू पाने का और सुखी होने का उनका अधिकार भी हमारे ही समान है। अब जब आप यह समझ लेते है कि उनकी सुख की चाह और उसे प्रात्‍प करने का उनका अधिकार आपके ही समान है, तो फिर स्‍वाभाविक रूप से आपके मन में उनके लिए सहानुभूति पैदा हो जाएगी। उनके प्रति निकटता का भाव पैदा होगा। इसका असर यह होगा कि आपमें सार्वभौमिक परोपकार की भावना का उदय होगा और आपके मन में दूसरों के लिए एक उत्तरदायित्‍व की भावना उत्‍पन्‍न होगी। उनकी सक्रिय रूप से सहायता करने की इच्‍छा होगी। यह इच्‍छा सीमित नहीं है। यह सब पर समान रूप से लागू होती है। आप उनमें भेदभाव भी नहीं कर पाएंगे। धैर्य तथा संयम की राह पर चलते हुए आप इस प्रकार की करूणा का विकास कर सकते है। नि:सन्‍देह आत्‍मकेन्द्रित होने की भावना आधारभूत रूप से हमारी करूणा की अभिव्‍यक्ति को संकुचित करती है। सच्‍ची करूणा की अनुभूति उसी समय होती है, जब इस प्रकार की आत्‍मकेन्द्रित भावना से दूर रहा जाए। इसके लिए हमें करूणा के सबसे बड़े अवरोध, क्रोध तथा घृणा को दूर करते हुए शुरूआती करनी चाहिए। अनुभव से हम यह अच्‍छी तरह से  जानते है कि क्रोध और घृणा जैसे भाव बहुत शक्तिशाली होते है। ये हम पर हावी हो सकते है, परन्‍तु जागरूक रहें तो उनको काबू में किया जा  सकता है। ध्‍यान रहे यदि उन्‍हें काबू में नहीं किया गया, तो वे नकारात्‍मक भावनाएं हमें ही पीडि़त करेंगी और हमारे भीतर करूणा का विकास करने में बाधक बन जाएंगी।  

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