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ACADEMY FOR STENOGRAPHY, DIR- BHADORIYA SIR MPHC DISTRICT COURT AG-3

created Nov 22nd 2022, 03:57 by mahaveer kirar


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वादग्रस्‍त भूखंड याची के नाम अंकित थे। प्रत्‍यर्थी संख्‍या 1 ने सरकारी नीलामी द्वारा प्राप्‍त प्रमाणपत्र के आधार पर नामांतरण प्रार्थना पत्र दिया जिसे चकबंदी अधिकारी ने स्‍वीकार किया और याची की अपील निरस्‍त हुई। उत्‍तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 48 के अधीन संस्थित निगरानी खारिज हुई। अंत में उच्‍चतम न्‍यायालय में विशेष अपील प्रस्‍तुत हुई। उच्‍चतम न्‍यायालय के निर्णय एवं आदेश को ग्राम्‍य अभिलेखों में करने हेतु धारा 48 की धारा 3 के अधीन कार्यवाही की गई। अत: उस में पिटीशन फाइल किया है। विचारणीय प्रश्‍न यह है कि क्‍या उच्‍च न्‍यायालय द्वारा उच्‍चतम न्‍यायालय के आदेश का क्रियान्‍वयन स्‍थगित किया जा सकता है। याचिका खारिज करते हुए, अभिनिर्धारित अनुच्‍छेद 141 के प्रथमदृष्‍टया अवलोकन से यह परिलक्षित होता है कि भारत के सभी न्‍यायालय तथा न्‍यायालयीय अधिकरण, सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा उद्घोषित विधि-प्रश्‍नों एवं सर्चोच्‍च न्‍यायालय द्वारा पारित जयपत्र, न्‍यायपत्र या आदेश को मानने के लिए तथा जो सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा विधि व्‍यवस्‍थाओं को स्‍पष्‍टीकरण किया गया है, उसको मानने के लिए बाध्‍य हैं। यदि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायपत्र, प्रिवी काउंसिल के न्‍यायपत्र से या किसी विदेशी न्‍यायपत्र से कुछ विपरीत भी पड़ते हों तो भी सर्वोच्‍च न्‍यायालय का न्‍यायपत्र, जयपत्र या आदेश सभी न्‍यायालयों एवं अधिकरणों को मान्‍य है। यदि एकपक्षीय निर्णय भी सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा पारित किया जाता है तो वह भी, भारत वर्ष के सभी न्‍यायालयों पर बाध्‍य होगा। चूंकि आदेश आदेश दिनांक 29 मार्च, 1990 ई. सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा पारित किया गया है अत: संविधान के अनुच्‍छेद 141 के अनुसार यह उच्‍च न्‍यायालय पर भी प्रभावी है एवं उच्‍च न्‍यायालय इस आदेश को सम्‍मान स्‍वीकार करने के लिए तथा उसके अनुरूप आदेश पारित करने के लिए बाध्‍य है। इस प्रकार संवैधानिक दृष्टिकोण से भी सर्वोच्‍च से भी सर्वोच्‍च न्‍यायालय के आदेश दिनांक 29 मार्च, 1990 ई. को स्‍थगित करने को कोई क्षेत्राधिकार, उच्‍च न्‍यायालय को दृष्टिगत नहीं होता। उच्‍च न्‍यायालय केा उच्‍चम न्‍यायालय द्वारा पारित न्‍यायपत्र, जयपत्र या आदेश के क्रियान्‍वयन स्‍थगित करने का अधिकार नहीं है तथा न्‍याय प्रक्रिया के सिद्धांत भी इस प्रकार का कोई अधिकार इंगित नहीं करते तो इसका कोई औचित्‍य ही है।  

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