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created Jan 25th, 06:30 by Vikram Thakre


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एक समय की बात है. एक घना जंगल था, जिसमें हर तरह के छोटे-बड़े जानवरों और पक्षियों का बसेरा था। उसी जंगल के एक पेड़ पर घोंसला बनाकर एक नन्‍ही चिडि़या भी रहा करती थी। एक दिन उस जंगल में भीषण आग गई। समस्‍त प्राणियों में हा-हाकार मच गया। सब अपनी जान बचाकर भागने लगे। नन्‍ही चिडि़या जिस पेड़ पर रहा करती थी, वह भी आग की चपेट में गया था। उसे भी अपना घोंसला छोड़ना पड़ा। लेकिन वह जंगल की आग देखकर घबराई नहीं। वह तुरंत नदी के पास गई और अपनी चोंच में पानी भरकर जंगल की ओर लौटी। चोंच में भरा पानी आग में पानी छिड़ककर वह फिर नदी की ओर गई। इस तरह नदी से अपनी चोंच में पानी भरकर बार-बार वह जंगल की आग में डालने लगी। जब बाकी जानवरों ने उसे ऐसा करते देखा, तो हंसने लगे और बोले, अरे चिडि़या रानी, ये क्‍या कर रही हो? चोंच भर पानी से जंगल की आग बुझा रही हो। मूर्खता छोड़ो और प्राण बचाकर भागो। जंगल की आग ऐसे नहीं बुझेगी।
उनकी बातें सुनकर नन्‍हीं चिडि़या बोली, तुम लोगों को भागना है, तो भागो। मैं नहीं भागूंगी। ये जंगल मेरा घर है और मैं अपने घर की रक्षा के लिए अपना पूरा प्रयास करूंगी। फिर कोई मेरा साथ दे दे। चिडि़या की बात सुनकर सभी जानवरों के सिर शर्म से झुक गए। उन्‍हें अपनी गलती का अहसास हुआ। सबने नन्‍हीं चिडि़या से क्षमा मांगी और फिर उसके साथ जंगल में लगी आग बुझाने के प्रयास में जुट गए। अंतत: उनकी मेहनत रंग लाई और जंगल में लगी आग बुझ गई। विपत्ति चाहे कितनी ही बड़ी क्‍यों हो? बिना प्रयास के कभी हार नहीं मानना चाहिए।
 

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