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साँई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565

created Jan 15th, 03:21 by Jyotishrivatri


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कोरोना महामारी की तीसरी लहर के चलते चुनाव आयोग ने राजनीतिक सभाओं को डिजिटल कर दिया है। इससे जहां आइटी सेल मे महारत हासिल कर चुकी भारतीय जनता पार्टी निश्चिंत है वही इस क्षेत्र में पीछे चल रही कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और कम्‍यूनिस्‍ट पार्टीयां आशंकाओं में जी रही है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि इससे सभी दल एक धरातल पर नहीं खड़े होंगे। और चुनावी मुकाबला गैर-बराबरी पर आधारित होगा। उनका यह भी आरोप है कि ऐसा आयोग ने भारतीय जनता पार्टी के हितों को देखते हुए किया है। पर संचार माध्‍यमों को लेकर विपक्ष का यह आरोप नया नहीं है। 1977 से लेकर आज तक विपक्ष आरोप लगाता रहा है सत्ता पक्ष के पास ज्‍यादा शक्तिशाली संचार माध्‍यम है और वह उनका सहारा लेकर जनमत के साथ हेराफेरी कर सकता है। इसके बावजूद भारतीय लोकतंत्र और जनमानस ने संचार माध्‍यमों के दुष्‍प्रचार और झूठ से प्रभावित हुए बिना सत्ता परिवर्तन किया है और अपने मन की सरकारें चुनी है। ऐसा हुआ होता तो भारतीय राजनीति में एक दलीय शासन से गठबंधन की सरकारों का दौर आता और ही गठबंधन की सरकारों से फिर एक दल को बहुमत मिलने का दौर आता। संचार प्रौद्योगिकी में निरंतर विकास हो रहा है और मार्शल मैकलुहान ने जिस ग्‍लोबल विलेज की कल्‍पना बीती सदी के दौरान साठ के दशक में की थी वह आज साकार हो चुकी है। उसी के साथ आकार हो रही सूचना प्रौद्योगिकी के जरिए नागरिक अधिकारों के नियंत्रण की वह अवधारणा भी, जिसे जार्ज ओरवेल ने अपने उपन्‍यास 1984 में 1948 में व्‍यक्‍त किया था। हालांकि जब ओरवेल ने यह आशंका व्‍यक्‍त की थी या मैकलुहान ने ग्‍लोबल विलेज की कल्‍पना विकसित की थी, तब इंटरनेट का आगमन ही नहीं हुआ था। आज सोशल मीडिया ने समाचारों और संवाद के लिए एक नई पारिस्थितिकी विकसित की है, जिसमें गति तो है लेकिन नियंत्रण और फिल्‍टर नहीं है। इसके बहुत खतरे हैं और उन्‍हीं खतरों को पोस्‍ट यूग के रूप में देखा भी जा रहा है। वैश्विक सुरक्षा, संचार प्रौद्योगिकी और मानवाधिकारों पर बढते खतरे के बारे में टोरंटो यूनिवर्सिटी में सिटिजन लैब चलाने वाले राजनीति शास्‍त्र के प्रोफेसर रोनाल्‍ड जे. डीबर्ट ने दो साल पहले इन्‍हीं तमाम मुद्दों को लेकर रिसेट: रिक्‍लेगिंग इंटरनेट फॉर सिविल सोसायटी जैसी पुस्‍तक लिखी जो उनके कुछ खास अवसरों पर दिए गए व्‍याख्‍यानों का संकलन है। पुस्‍तक के आखिरी अध्‍याय में सोशल मीडिया को छोड़ने, उसमें सुधार करने और उसे नियमित करने की बात की गई है। क्‍योंकि इसने लोगों के जीवन, राजनीतिक प्रणाली और पर्यावरण को बहुत क्षति भी पहुंचाई है। डाबर्ट को इस बात का भी अहसास है कि कोविड महामारी के दौर में डिजिटल माध्‍यमों ने लोगों की रक्षा भी की है। उसके सहारे लोगों की नौकरियां, शिक्षा, तमाम तरह की खरीद-बिक्री और कारोबार चला है। सोशल मीडिया की तमाम बुराइयों के बावजूद उसने विभिन्‍न परिवारों और मित्रों को जोडने और एक-दूसरे से संपर्क बनाए रखने में भी मदद की है। जिससे इस महामारी से बना अवसाद टूटा है।   

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