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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || ༺•|✤आपकी सफलता हमारा ध्‍येय✤|•༻

created Jan 12th, 10:58 by Vivek Sen


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राजा जनक बहुत ज्ञानी थे परन्‍तु उनका ज्ञान किसी गुरू से प्राप्‍त नहीं था। उनकी किसी को गुरु बनाकर ज्ञान प्राप्‍त करने की तीव्र इच्‍छा हुई। कई दिनों तक विचार करने के बाद एक उपाय सूझा। उनका राज-काज प्रभावित हो इसलिए सच्‍चे ज्ञानी ही उनके पास सकें इसलिए उन्‍होंने पूरे नगर में घोषणा करवा दी कि जो कोई मुझे अभी तक प्राप्‍त हुआ ज्ञान का उपदेश देगा, उसे इच्‍छानुसार धन प्रदान किया जाएगा परन्‍तु यदि वह ज्ञान का उपदेश देने में समर्थ हो पायेगा तो उसे जेल में बंद कर दिया जाएगा।
    राजा जनक की घोषणा को सुन-सुनकर बहुत सारे तथाकथित ज्ञानी सभा में पहुंचे, परंतु जनक को समुचित ज्ञान का उपदेश कर सके और उनको बंदगृह में जाना पड़ा। अष्‍टावक्र के पिता भी अपने ज्ञान के अहंकार और धन के लोभ में राजा जनक की सभा में पहुंच गये। वे राजा अनुसार ज्ञान प्रदान कर सके और उन्‍हें भी जेल में जाना पड़ा। समाचार पाते ही पिता को जेल से छुड़ाने के लिए अष्‍टावक्र जनक के राजदरबार पहुंच गये। अष्‍टावक्र के अंग टेढ़े-मेढ़े थे जिससे की वह बहुत कुरूप दिखते थे।
    उस समय राजा जनक स्‍वयं भी सभा में विराजमान थे। अष्‍टवक्र के शरीर को देखकर राजदरबारियों और सभा में मौजूद ज्ञानियों को हंसी गयी। सबकी हंसी से सभा में ठहाके की आवाज गूंज गयी। ऋषिकुमार अष्‍टवक्र इस प्रकार के अनुचित व्‍यवहार से विचलित नहीं हुए। उन्‍होंने दरबारियों की हंसी का उत्‍तर और अधिक ठहाके की हंसी से दिया।
    अष्‍टावक्र के इस प्रकार के हंसते हुए देखकर राजा जनक को बहुत आश्‍चर्य हुआ। राजा ने ऋषिकुमार से पूछा महाराज आप क्‍यों हंस रहे हैं। अष्‍टावक्र ने प्रतिउत्‍तर में पूछा आप लोग मुझे देखते ही क्‍यों हंसे थे। राजा जनक ने कहा आपके टेढ़े-मेढ़े शरीर को देखकर हम लोगों को अनायास ही हंसी गयी।
    ऋषिकुमार ने अपनी हंसी का कारण बताया मुझे तो आप लोगों के सुंदर शरीर के भीतर कितनी गंदगी भरी पड़ी है, उसे देखकर इतनी जोर की हंसी आयी। भला, मिथिला नरेश, जिनकी सभा में ज्ञान की चर्चा होती है, ज्ञान प्राप्‍त करने के लिए जिन नरेश ने डंका पिटवाया है, उनके दरबारी तथा स्‍वयं वे भी शरीर के रूप-रंग और बनावट के प्रेमी हैं। उनके यहां ज्ञान की नहीं, नश्‍वर शरीर की महत्‍ता है। जहां ज्ञान की चर्चा के लिए सभा जुटी हो, वहां ईश्‍वर द्वारा प्रदान शरीर की बनावट देखकर हंसना मानव की मानवता नहीं, दुर्बलता कही जायेगी। राजा जनक के यहां ज्ञान नहीं, नश्‍वर शरीर के रूप-रंग बनावट की महत्‍ता है यह वाक्‍य जनक को बैचेन कर गया। सभी दरबारियों ने लज्‍जा के कारण सिर झुका दिया।

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