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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || ༺•|✤आपकी सफलता हमारा ध्‍येय✤|•༻

created Nov 24th 2020, 10:01 by Subodh Khare


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छत्रसाल बड़े प्रजापालक थे। वे अपनी प्रजा की देखभाल पुत्र के समान करते थे। वे राज्‍य का दौरा करते और जनता से उसकी कठिनाईयां पूछते थे। एक बार एक युवती महाराज की ओर आकर्षित हुई। वह उनके पास आकर बोली राजन आपके राज्‍य में मैं दु:खी हूं। यह सुनकर छत्रसाल बड़े व्‍याकुल हुए। वे सोच में पड़ गये। मन-ही-मन कहने लगे मेरे लगातार प्रयत्‍नशील रहने पर भी राज्‍य की जनता दुखी रहे, यह मेरे लिए बड़े कष्‍ट की बात है।
    उन्‍होंने महिला से पूछा देवी बताइये आपको क्‍या कष्‍ट है। मैं उसे दूर करने का यथाशीघ्र प्रयत्‍न करूंगा। ऐसी आश्‍वासन भरी बातें सभी करते हैं, पर पूरी करने वाले बिरले ही होते हैं। पहले आप वचन दे तो मैं अपनी बात बता सकती हूं युवती ने जवाब दिया। हां, हां आप अपनी बात नि:संकोच कहिये। सरल हृदयी महाराज का उत्‍तर था।  
    मैं चाहती हूं कि आप जैसी संतान मेरी भी हो। युवती का जवाब था। महाराज यह सुनकर स्‍तब्‍ध रह गये। फिर विवेक संयम से काम लेते हुए उन्‍होंने उस नारी से चरणों में मस्‍तक झुकाकर निवेदन किया मां आप जिस पुत्र की कल्‍पना कर रही हैं, संभव है, वह मेरी तरह हो, अत: आज से आप मुझे ही अपना पुत्र स्‍वीकार करें। नरेश का उत्‍तर सुनकर नारी की मुह-मुरछा जगी। उसे अपनी गलती का बोध हो गया। राजा जीवन भर उसके प्रति राजमाता के समान सम्‍मान रखते रहे।

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